दुनिया के भीतर एक और दुनिया

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May 31, 2016

दुनिया के भीतर एक और दुनिया

पिछले हफ्ते मेरा अचानक फोन ख़राब हो गया सर्विस सेंटर गया तो तो पता चला फोन एक हफ्ते के बाद मिलेगा.... एक हफ्ते????.

ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी फिल्म में कोई डॉक्टर हीरो से कह रहा हो बस 6 महीने और है और हीरो गिड़गिड़ा रहा होकुछ तो कीजिये डॉक्टर...” मेरी भी हालत कुछ वैसी ही थी एक हफ्ते बिना फोन के कैसे???
इसके बिना दुनिया ही रुक जाएगी, मेरे लिए यह उतना ही जरूरी है, जितना मेरा हाथ…

आज फोन पर बात करने से ज्यादा चिंता व्हाट्सप्प और फेसबुक के नोटिफिकेशन की है | और ये सिर्फ मेरी नहीं बल्कि आज के ज्यादातर युवा का यही हाल है असल में आज हमें जरूरत से बहुत ज्यादा सूचनाएं उपलब्ध हैं और उन सबसे जुड़े रहने की बुरी आदत भी हमने अपना ली है | हमने अपनी दुनिया के भीतर एक और दुनिया बना रखा है जिसको हम आभासी (वर्चुअल) दुनिया कहते है और इस दुनिया में जीने, रहने की आदत डाल ली है हमने, इसके बिना या इससे दूर रह पाना मुस्किल सा लगता है|

हालांकि ऐसा मुस्किल है नहीं ऐसा मैंने इस एक हफ्ते महसूस किया | दिन भर सोशल मीडिया ने मेरा ध्यान नहीं बटाया, ना ही -मेल ने परेशान किया इसके बजाय इन दिनों जिससे मिला पूरा समय दिया, अच्छी तरह बात किया, अख़बार, मैगजीन, ब्लॉग पर वक़्त दिया.. कुछ दिक्कतों से भी 2-4 होना पड़ा जैसे किसी का फोन नंबर होने से दिक्कत आरही थी लेकिन किसी तरह काम चल गया |

वर्चुअल दुनिया से दूर रहने को आजकल समझदारी की तरह से पेश किया जाता है। माना जाता है कि ये इंसान के लिए अच्छा है अपनी आजादी और अपनी रचनात्मकता वापस मिल जाती है और अपने वास्तविक रिश्तों पर ज्यादा फोकस कर पाता है |



तभी तो आज जहां हमारे देश में इंटरनेट, वाई-फाई के नाम पे सरकार बन जा रही है वहीं फ्रांस जैसे कुछ देश में लोगों को डिस्कनेक्ट रहने का अधिकार देने की बात चल रही है। और मांग की जा रही है कि खासकर तकनीकी (IT) कंपनियों में काम करने वालों को शनिवार और इतवार को इंटरनेट से दूर रहने की इजाजत मिलनी चाहिए।

हालांकि अब ऑनलाइन और वास्तविक दुनिया अलग-अलग नहीं हैं। और न ही इनको अब अलग कर पाना हमारे बस में रह गया है क्योंकि सोशल मीडिया सिर्फ तस्वीरें साझा करने और कमेंट करने भर तक सिमित नही रहा यह परिवार से जुड़ने का जरिया है, अपनी बात लोगो तक पहुंचाने का तेज़ और धारदार हथियार बन चुका है इसलिए इससे जुड़े रहना जरुरी है|

लेकिन क्या हफ्ते में सिर्फ 1 दिन हम भी ‘DISCONNECT DAY’ मना सकते है??



देखे ये वीडियो जिसने ये पोस्ट लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया

3 comments:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति ब्लॉग बुलेटिन - अलविदा ~ रज्जाक खान में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  3. बहुत अच्छा लिखा है आपने.
    नाम पसंद आया- एक गुल्लक ऐसा भी.

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