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November 17, 2016

एक पड़ताल सोनम गुप्ता बेवफा क्यों है?

भारत में नए नोट बाजार में आने के साथ एक और नाम इन दिनों खूब चर्चा में है वो नाम है 'सोनम गुप्ता' का वो सोनम गुप्ता जो बेवफा है|

अब ये कौन है और इसने किसके साथ बेवफाई की है ये किसीको नहीं पता है फ़िलहाल सोसल मीडिया पर सोनम गुप्ता ने करेंसी (#currency) और काफी विद करण (#coffeewithkaran) जैसे विषय (hash tag) को भी पीछे छोड़ दिया है|

अब बात शुरू हुयी है कोई तो आगे भी बढ़ेगी ही, बात कही से भी शुरू हुयी हो लेकिन चुटकुलों का दौर नहीं थम रहा कोई सोनम को बेवफा कह रहा है तो कोई उसके साथ है जो ये कह रहा है की सोनम नहीं बल्कि उसका आशिक बेवफा है, नोट बदलवाने के चक्कर में परेशान लोंगो के लिए सोनम गुप्ता धुप की बारिश बन के आयी है लाइन में खड़े लोंगो का अच्छा टाइम पास हो रहा है लोग अपने अपने हिसाब से कयास लगा रहे है|

हालाँकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ नोटों पर लिखने की हमारी आदत बहुत पुरानी है नाम लिखे हुए नोट अकसर मिल जाते है लेकिन हम ध्यान नहीं देते बस एक हाथ से दूसरे हाथ में चले जाते है|
इसी आदत के चलते किसी आशिक़ ने 10 रु. के नोट पर लिख दिया "सोनम गुप्ता बेवफा है" हो सकता है वो काफी पहले लिखा हो लेकिन वो नोट किसीने सोशल मीडिया पर डाल दिया क्योंकि आज जमाना सोशल मीडिया का है जिसमे इतनी ताकत है की सरकार तक बदल जा रही है उस सोशल मीडिया से सोनम कैसे बच जाती, कुछ दिन तक ये सोशल मीडिया में छाया रहा लेकिन इतना असर नहीं हुआ फिर 8 नवम्बर को जब 500 और 1000 के नोट बंद होने का ऐलान हुआ तब पूरी दुनिया भारतीय नोटों के बारे में बात करने लगी यहाँ तक की अमेरिका में होने वाला चुनाव भी चर्चा का विषय नहीं बन पाया|

उसके बाद जब पहली बार 2000रु. के नोट भारतीय बाजार में आये तो लोंगो ने उस नोट की खूब बातें की किसीने उसके गुलाबी रंग के बारे में लिखा तो किसी ने साइज़ के बारे में ऐसे ही जब किसीने ये लिखा कि 2000 रु. के नोट पर सोनम गुप्ता बेवफा है लिखने के लिए काफी जगह है.. बस इतना लिखना था कि सोनम गुप्ता फिर से आ गयी चर्चा में क्योंकि इस समय नोटों पर चर्चा का माहौल है ऐसे में लोग सोनम गुप्ता पर अपनी अपनी राय सोशल मीडिया पर व्यक्त करने लगे देखते देखते मजाक और कमेंट का दौर बढ़ता गया और सोनम गुप्ता हो गयी वायरल|

सोनम गुप्ता की पूरी कहानी यहाँ पढें -

"बात है 2010 की. सोनम गुप्ता का इंटर पूरा हो गया था. रिजल्ट का इंतजार था. समय था फॉर्म भराई का. रोज साइबर कैफे के चक्कर लगते. क्योंकि गुप्ता अंकल मानते थे कि इंटरनेट लगवाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं.

विक्की भइया बीकॉम थर्ड इयर में घिस-घिस के पहुंच चुके थे. सबसे जिगरी दोस्त अतुल निगम की शादी हुई थी अभी लेटेस्ट में. तबसे अतुल निगम ऐसा बेडरूम में घुसे थे कि निकलने का नाम नहीं लेते थे. विक्की भइया ने अकेलेपन में फेसबुक का सहारा ले लिया था.

5 बजे सोनम गुप्ता साइबर कैफ़े पहुंचती. आधे घंटे के 10 रुपये लगते थे. साढ़े पांच बजे गुप्ता अंकल ऑफिस से लौटते हुए स्कूटर का हॉर्न देते. सोनम पापा के साथ घर चली जाती. जबसे विक्की भइया ने सोनम को देखा था, साइबर कैफ़े जाने का टाइम बदल दिया था. 8 दिन. पूरे 8 दिन सामने वाली कंप्यूटर स्क्रीन के पीछे सोनम को देखते रहे. इंटरनेट सोनम के लिए नई चीज थी. एक अद्भुत खिलौना था. आंखें फाड़ के चीजें देखा करती. कभी कभी मुस्कुराती. विक्की भइया का अकेलापन मिटता जाता.

8वें दिन सोनम फिर उसी कंप्यूटर पर बैठी. विक्की भइया अपने कंप्यूटर पर. सोनम धीरे-धीरे टाइप करती. कैफ़े के कीबोर्ड पर आवाज तेज-तेज होती. सोनम हल्के-हल्के से मुस्कुराती. कभी तेजी से ब्लश करती और दांत से अपनी मुस्कान काट के रोक लेती. अचानक सोनम की आंखें उठीं. विक्की भइया से मिल गईं. विक्की भइया तो जैसे बेहोश. स्क्रीन पर देखते हुए तेजी से फ्यूचर की प्लानिंग करने लगे. ये तक सोच लिया गुप्ता अंकल से बेटी का हाथ मांगेंगे तो क्या कहेंगे.

इतने में पापा के स्कूटर का हॉर्न बजा. सोनम हड़बड़ा गई. चेहरे की रंगत बदल गई. जल्दी-जल्दी टाइप करने लगी. हॉर्न फिर से बजा. कांच के दरवाजे से देखा पापा झांक रहे थे. सोनम उठी, और झट से भाग गई.

विक्की भइया उठे. बेखुदी में सोनम के कंप्यूटर पर पहुंचे. हाय, उसका फेसबुक खुला छूट गया था जल्दी में. एक चैट विंडो खुली थी. विक्की भइया खुद को रोक नहीं पाए. मैसेज पढ़ते गए. ऐसा लगता कोई जानवर अपने नुकीले पांव उनके कलेजे में धंसाता जा रहा है. इतने में पीछे से आवाज आई, ‘विक्की भइया, आधा घंटा हो गया. टाइम बढ़ा दूं?’

‘नहीं’, विक्की भइया ने कहा. कुर्सी से उठे. चमड़ी छोड़ते पर्स से 10 का नोट निकाला. जाते जाते उसपर लिखा, ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’. और नोट थमाकर बाहर निकल गए. फिर कभी उस कैफ़े में लौटकर नहीं आए. "

तो ये थी सोनम गुप्ता के बेवफाई की कहानी हमारे अनुसार अगर आपके अनुसार कुछ और है तो निचे कॉमेंट बॉक्स में लिखें ....







October 28, 2016

दिवाली का वो जेब कतरा

दिवाली की शाम घर जाने के लिए बस से उतरकर जेब में हाथ डालते ही वो चौंक पड़ा। जेब कट चुकी थी। जेब में था भी 
क्या? कुल लेदेकर नौ रुपये और एक खत, जो उसने अपनी माँ को लिखा था, कि "मेरी नौकरी छूट गई 
है। इस दिवाली पैसे नहीं भेज पाऊँगा।" तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड जेब में पड़ा था, पोस्ट 
करने को मन नही नहीं कर रहा था। कुल जमा पूंजी के नौ रुपये जा चुके थे। यूँ तो नौ रुपये कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए नौ रुपये नौ सौ से कम नहीं होते। ऊपर से दिवाली का दिन माँ को क्या जवाब देगा?


कुछ दिन गुजरें, माँ का खत मिला, पढ़ने से पूर्व सहम गया। जरूर पैसे भेजने का लिखा 
होगा, लेकिन खत पढ़कर हैरान रह गया। माँ ने लिखा था, ‘‘बेटा, तेरा पचास 
रुपए का भेजा हुआ मनिआर्डर मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे!...पैसे भेजने 
में कभी लापरवाही नहीं बरतता।’’


वो इसी उधेड़बुन में लग गया कि आखिर माँ को मनीऑर्डर किसने भेजा होगा?

कुछ दिन बाद एक और पत्र मिला। चंद लाइनें थीं, आढ़ी–तिरछी। बड़ी मुश्किल से खत 
पढ़ पाया। लिखा था, 


‘‘भाई ! नौ रुपये तुम्हारे और इकतालीस रुपये अपनी ओर से 
मिलाकर, मैंने तुम्हारी माँ को मनीऑर्डर भेज दिया है।....फिकर न करना।...माँ 
तो सबकी एक जैसी होती है न! वह क्यों भूखी रहे?


- "तुम्हारा जेबकतरा!’’


May 31, 2016

दुनिया के भीतर एक और दुनिया

पिछले हफ्ते मेरा अचानक फोन ख़राब हो गया सर्विस सेंटर गया तो तो पता चला फोन एक हफ्ते के बाद मिलेगा.... एक हफ्ते????.

ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी फिल्म में कोई डॉक्टर हीरो से कह रहा हो बस 6 महीने और है और हीरो गिड़गिड़ा रहा होकुछ तो कीजिये डॉक्टर...” मेरी भी हालत कुछ वैसी ही थी एक हफ्ते बिना फोन के कैसे???
इसके बिना दुनिया ही रुक जाएगी, मेरे लिए यह उतना ही जरूरी है, जितना मेरा हाथ…

आज फोन पर बात करने से ज्यादा चिंता व्हाट्सप्प और फेसबुक के नोटिफिकेशन की है | और ये सिर्फ मेरी नहीं बल्कि आज के ज्यादातर युवा का यही हाल है असल में आज हमें जरूरत से बहुत ज्यादा सूचनाएं उपलब्ध हैं और उन सबसे जुड़े रहने की बुरी आदत भी हमने अपना ली है | हमने अपनी दुनिया के भीतर एक और दुनिया बना रखा है जिसको हम आभासी (वर्चुअल) दुनिया कहते है और इस दुनिया में जीने, रहने की आदत डाल ली है हमने, इसके बिना या इससे दूर रह पाना मुस्किल सा लगता है|

हालांकि ऐसा मुस्किल है नहीं ऐसा मैंने इस एक हफ्ते महसूस किया | दिन भर सोशल मीडिया ने मेरा ध्यान नहीं बटाया, ना ही -मेल ने परेशान किया इसके बजाय इन दिनों जिससे मिला पूरा समय दिया, अच्छी तरह बात किया, अख़बार, मैगजीन, ब्लॉग पर वक़्त दिया.. कुछ दिक्कतों से भी 2-4 होना पड़ा जैसे किसी का फोन नंबर होने से दिक्कत आरही थी लेकिन किसी तरह काम चल गया |

वर्चुअल दुनिया से दूर रहने को आजकल समझदारी की तरह से पेश किया जाता है। माना जाता है कि ये इंसान के लिए अच्छा है अपनी आजादी और अपनी रचनात्मकता वापस मिल जाती है और अपने वास्तविक रिश्तों पर ज्यादा फोकस कर पाता है |



तभी तो आज जहां हमारे देश में इंटरनेट, वाई-फाई के नाम पे सरकार बन जा रही है वहीं फ्रांस जैसे कुछ देश में लोगों को डिस्कनेक्ट रहने का अधिकार देने की बात चल रही है। और मांग की जा रही है कि खासकर तकनीकी (IT) कंपनियों में काम करने वालों को शनिवार और इतवार को इंटरनेट से दूर रहने की इजाजत मिलनी चाहिए।

हालांकि अब ऑनलाइन और वास्तविक दुनिया अलग-अलग नहीं हैं। और न ही इनको अब अलग कर पाना हमारे बस में रह गया है क्योंकि सोशल मीडिया सिर्फ तस्वीरें साझा करने और कमेंट करने भर तक सिमित नही रहा यह परिवार से जुड़ने का जरिया है, अपनी बात लोगो तक पहुंचाने का तेज़ और धारदार हथियार बन चुका है इसलिए इससे जुड़े रहना जरुरी है|

लेकिन क्या हफ्ते में सिर्फ 1 दिन हम भी ‘DISCONNECT DAY’ मना सकते है??



देखे ये वीडियो जिसने ये पोस्ट लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया