पिछले कुछ समय से मैं अपने आसपास एक अजीब बदलाव देख रहा हूँ। छोटे-छोटे निर्णय हों या सामान्य-सा लेखन, हर सवाल का पहला जवाब होता है - "AI से पूछ लेते हैं।"
पहले लगा कि
यह सुविधा है।
फिर महसूस हुआ
कि धीरे-धीरे
सुविधा, आदत बन रही है
और आदत, निर्भरता।
शोले का ठाकुर
बेबस था। उसके
दोनों हाथ नहीं
थे। वह चाहकर
भी बंदूक नहीं
उठा सकता था,
तलवार नहीं चला
सकता था। उसकी
मजबूरी दिखाई देती
थी, इसलिए उस
पर दया भी आती थी।
लेकिन आज का
ठाकुर?
उसके दोनों हाथ सलामत हैं। उंगलियाँ कीबोर्ड पर दौड़ती हैं, मोबाइल हर समय हाथ में रहता है, सामने अत्याधुनिक कंप्यूटर रखा है। फिर भी वह असहाय है।
अंतर बस इतना
है कि शोले वाले ठाकुर
के हाथ किसी
और ने काटे थे, जबकि
आज के ठाकुर
ने अपने हाथ
खुद बाँध लिए
हैं।
आज दफ़्तरों में जाइए।
किसी से कहिए कि एक
पत्र लिख दीजिए।
जवाब मिलेगा - "पहले
AI से लिखवा लेते
हैं।"
किसी डिज़ाइनर से कहिए कि एक
नया विचार दीजिए।
उत्तर आएगा - "एक
मिनट, AI से कुछ
विकल्प निकलवा लेता
हूँ।"
प्रोग्रामर से कहिए
कि समस्या का
समाधान खोजिए। वह
पहले AI से पूछेगा
कि समाधान क्या
हो सकता है।
मार्केटिंग वाले से
रणनीति पूछिए, शिक्षक
से नोट्स बनवाइए,
छात्र से निबंध
लिखवाइए - हर जगह
एक ही अदृश्य
सलाहकार मौजूद है।
AI
सवाल AI के होने
का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या
हमारी अपनी सोच
अब भी मौजूद
है?
हमने सुविधा को
क्षमता समझ लिया
है।
तकनीक का उद्देश्य
हमारी गति बढ़ाना
था, हमारी बुद्धि
का स्थान लेना
नहीं।
कभी कैलकुलेटर आया था। उसने गणना
आसान कर दी, लेकिन गणित
नहीं छीना। इंटरनेट
आया, उसने जानकारी
आसान कर दी, लेकिन जिज्ञासा
नहीं छीनी। अब
AI आया है, जिसने
काम आसान कर दिया है।
डर इस बात का है
कि कहीं यह सोचने की
आदत ही न छीन ले।
आज कई लोग
बिना AI के दो पैराग्राफ़ लिखने में
असहज महसूस करते
हैं। ईमेल भेजने
से पहले AI, सोशल
मीडिया पोस्ट से
पहले AI, प्रस्तुति से पहले
AI, यहाँ तक कि
भावनाएँ व्यक्त करने
से पहले भी
AI।
लगता है जैसे
दिमाग़ छुट्टी पर
चला गया हो और नौकरी
पर केवल "प्रॉम्प्ट"
आ रहा हो।
विडंबना देखिए।
हम उस दौर
में जी रहे हैं जहाँ
जानकारी सबसे ज़्यादा
है, लेकिन मौलिक
विचार सबसे कम दिखाई देने
लगे हैं। हर लेख एक
जैसा, हर पोस्ट
एक जैसी, हर
विज्ञापन एक जैसा
और हर उत्तर
भी लगभग एक जैसा।
मशीनें एक जैसी
भाषा बोल सकती
हैं। इंसान नहीं।
इंसान की पहचान
उसकी सोच, अनुभव,
संवेदनशीलता और कल्पना
है। यदि वही किसी मशीन
के भरोसे छोड़
दी जाए, तो फिर हमारे
और मशीन के बीच अंतर
ही क्या बचेगा?
मैं AI का विरोधी
नहीं हु आज के दौर
में कोई हो भी नहीं
सकता, लेकिन मैं
विरोधी उस मानसिक
आलस्य का हु जो AI की
आड़ में पनप रहा है।
AI एक उत्कृष्ट सहायक है।
वह तेज़ है,
धैर्यवान है और
विशाल जानकारी रखता
है। लेकिन वह
आपके जीवन के अनुभव नहीं
जानता, आपकी संवेदनाएँ
महसूस नहीं करता
और आपकी मौलिकता
का विकल्प कभी
नहीं बन सकता।
हथौड़ा आने से
कारीगर खत्म नहीं
हुए। कैमरा आने
से चित्रकार खत्म
नहीं हुए। कंप्यूटर
आने से लेखक खत्म नहीं
हुए। लेकिन यदि
लेखक लिखना छोड़
दे, चित्रकार कल्पना
छोड़ दे और कारीगर हुनर
छोड़ दे, तो दोष औज़ार
का नहीं, उपयोग
करने वाले का होगा।
शोले का ठाकुर
अपने कटे हुए हाथों के
बावजूद अन्याय के
सामने झुका नहीं
था। आज का
"दो हाथ वाला
ठाकुर" दोनों हाथ
होने के बावजूद
कई बार अपनी
सबसे बड़ी ताकत,
अपनी सोच का इस्तेमाल करना ही छोड़ देता
है।
शायद आने वाले
वर्षों में सबसे
बड़ा संकट नौकरियों
का नहीं होगा।
सबसे बड़ा संकट
मौलिक विचारों का
होगा।
और उस दिन
हमें यह एहसास
होगा कि AI ने
हमारे हाथ नहीं
काटे थे।
हमने ही अपनी
सोच उसके हवाले
कर दी थी।
तकनीक का स्वागत
कीजिए। AI का भरपूर
उपयोग कीजिए। लेकिन
हर उत्तर से
पहले एक बार अपने दिमाग़
से भी पूछिए।
हो सकता है
वहाँ से मिलने
वाला उत्तर मशीन
से थोड़ा धीमा
हो...
लेकिन वह आपका
अपना होगा।

